
Gen Z और सेना: बढ़ती दूरी या संवाद की कमी?लेखक: कैप्टन अजीत कुमार पाण्डेयसंरक्षक, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक संगठन, जौनपुर (उ.प्र.)आज देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ एक ओर हमारी युवा पीढ़ी—विशेषकर Gen Z—नई सोच, नई तकनीक और अपने अधिकारों के प्रति अत्यंत जागरूक है, वहीं दूसरी ओर सेना और अर्धसैनिक बल अनुशासन, कर्तव्य और राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।
कभी-कभी इन दोनों सोच के बीच टकराव दिखाई देता है। प्रश्न यह है कि क्या Gen Z वास्तव में सेना या पैरा मिलिट्री के प्रति आक्रोशित है, या फिर यह दो पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी का परिणाम है?सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कुछ घटनाओं या सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को सेना-विरोधी मान लेना उचित नहीं होगा। भारत का युवा आज भी सैनिकों के त्याग, शौर्य और बलिदान का सम्मान करता है।
लेकिन वह हर संस्था से सवाल भी पूछता है और अपने अधिकारों तथा स्वतंत्रता को लेकर पहले की अपेक्षा अधिक सजग है।यहीं से कभी-कभी गलतफहमी पैदा होती है।एक सैनिक के लिए आदेश, अनुशासन और सुरक्षा-प्रोटोकॉल उसके कर्तव्य का हिस्सा हैं। सीमा क्षेत्र में किसी नागरिक की आवाजाही पर रोक, पहचान की जाँच अथवा कुछ समय के लिए इंतजार करवाना सामान्य नागरिक जीवन की दृष्टि से असुविधाजनक लग सकता है, लेकिन उसके पीछे सुरक्षा का गंभीर कारण हो सकता है। दूसरी ओर, युवा इसे यदि बिना उचित संवाद के देखता है तो उसे लग सकता है कि उसकी स्वतंत्रता या अधिकारों पर अंकुश लगाया जा रहा है।इस अंतर को समाप्त करने का रास्ता टकराव नहीं, बल्कि संवाद है।
सोशल मीडिया ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। आज कोई भी घटना कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। वीडियो का केवल एक हिस्सा देखकर लोग अपनी राय बना लेते हैं। पूरी परिस्थिति, सुरक्षा कारण और घटना का दूसरा पक्ष अक्सर सामने नहीं आ पाता। परिणामस्वरूप सैनिक और नागरिक के बीच अनावश्यक अविश्वास पैदा हो सकता है।हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि सेना और सुरक्षा बलों को जनता के प्रति सम्मानजनक व्यवहार और पारदर्शी संवाद बनाए रखना चाहिए। वर्दी अनुशासन का प्रतीक है, लेकिन साथ ही वह जनता के विश्वास का भी प्रतीक है। यदि किसी नागरिक को सुरक्षा कारणों से रोका जाता है, तो जहाँ तक संभव हो, उसे उचित और शालीन तरीके से कारण समझाना चाहिए।इसी प्रकार नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सुरक्षा व्यवस्था कोई सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है। सीमा पर तैनात सैनिक हर क्षण संभावित खतरे के बीच अपना कर्तव्य निभाता है। वह किसी नागरिक का दुश्मन नहीं है। वह उसी नागरिक और उसके परिवार की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालता है।आज आवश्यकता है कि पूर्व सैनिक, सेना और युवा पीढ़ी के बीच संवाद बढ़ाया जाए। स्कूल-कॉलेजों में पूर्व सैनिकों के अनुभवों पर कार्यक्रम हों। युवाओं को सीमा पर सैनिकों के जीवन, युद्ध की कठिनाइयों, आपदा के समय सेना की भूमिका और राष्ट्रीय सुरक्षा की वास्तविक चुनौतियों से परिचित कराया जाए।Gen Z को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे देश की सुरक्षा की वास्तविकता समझने का अवसर दिया जाए। और हमारी युवा पीढ़ी को भी यह समझना होगा कि प्रश्न करना उसका अधिकार है, लेकिन सैनिक का सम्मान करना भी उसकी जिम्मेदारी है।भारत की शक्ति केवल उसकी सेना में नहीं, बल्कि सेना और नागरिकों के बीच विश्वास में भी है।हम पूर्व सैनिकों का दायित्व है कि हम युवा पीढ़ी को दोष देने के बजाय उसके साथ बैठें, उसकी बात सुनें और अपने अनुभव साझा करें। वहीं युवाओं से भी हमारी अपील है कि किसी एक घटना, वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर पूरे सुरक्षा बल को कठघरे में खड़ा न करें।सैनिक और नागरिक दो अलग-अलग भारत नहीं हैं—दोनों मिलकर ही भारत हैं।आइए, आक्रोश की जगह संवाद, अविश्वास की जगह विश्वास और दूरी की जगह संवेदनशीलता पैदा करें। यही मजबूत भारत की नींव होगी।— कैप्टन अजीत कुमार पाण्डेयसंरक्षकअखिल भारतीय पूर्व सैनिक संगठन, जौनपुर (उ.प्र.)

















