रक्षा मंत्री ने माथे के गौरव को गरीब बेटी के पैरों की रुनझुन बनाकर जीत लिया दिल

पद के साथ कद भी ऊंचा है राजनाथ सिंह का
मुकुट से पायल तक: सम्मान की राजनीति का वह पाठ जो लखनऊ तक पहुंचना चाहिए
रक्षा मंत्री ने माथे के गौरव को गरीब बेटी के पैरों की रुनझुन बनाकर जीत लिया दिल
राजनाथ सिंह ने चांदी का मुकुट लौटाकर बताया—नेता की ऊंचाई उसके सिर पर रखे सम्मान से नहीं, समाज की बेटियों के जीवन में उतरी संवेदना से तय होती है। यह बात रविवार को उन्होंने खटीक गर्जना सम्मेलन में बोलकर सबका दिल जीत लिया।
आगरा में मंडल स्तरीय खटीक समाज गर्जना सम्मेलन का मंच केवल राजनीतिक सभा का मंच नहीं रहा। वहां सम्मान की एक ऐसी तस्वीर बनी, जिसने राजनीति के लिए एक गहरा संदेश छोड़ दिया।
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HIGHLIGHTS
  • स्वागत में चांदी का मुकुट आया। सामान्य राजनीति होती तो मुकुट सिर पर सजता, तस्वीरें खिंचतीं और सम्मान की कहानी वहीं समाप्त हो जाती। लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उस सम्मान को अपने तक…
  • माथे पर सजने वाला चांदी का मुकुट यदि किसी गरीब बेटी के पैरों में पायल बन जाए, तो उससे सुंदर लोकतांत्रिक संवेदना की कल्पना शायद मुश्किल है।
  • यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीति में महिला सशक्तिकरण की चर्चा बहुत होती है। मंचों पर बड़े-बड़े भाषण होते हैं, घोषणाएं होती हैं, पोस्टर लगते हैं और नारे गूंजते हैं। मगर असली कसौटी तब…
  • प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए नयी सीख प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए यह समय आत्ममंथन का है। महिला सशक्तिकरण केवल मंच पर महिलाओं को आगे बैठाने, महिला सम्मेलन करने या चुनावी घोषणापत्र में…

पद के साथ कद भी ऊंचा है राजनाथ सिंह कामुकुट से पायल तक: सम्मान की राजनीति का वह पाठ जो लखनऊ तक पहुंचना चाहिएरक्षा मंत्री ने माथे के गौरव को गरीब बेटी के पैरों की रुनझुन बनाकर जीत लिया दिल राजनाथ सिंह ने चांदी का मुकुट लौटाकर बताया—नेता की ऊंचाई उसके सिर पर रखे सम्मान से नहीं, समाज की बेटियों के जीवन में उतरी संवेदना से तय होती है। यह बात रविवार को उन्होंने खटीक गर्जना सम्मेलन में बोलकर सबका दिल जीत लिया।आगरा में मंडल स्तरीय खटीक समाज गर्जना सम्मेलन का मंच केवल राजनीतिक सभा का मंच नहीं रहा। वहां सम्मान की एक ऐसी तस्वीर बनी, जिसने राजनीति के लिए एक गहरा संदेश छोड़ दिया।स्वागत में चांदी का मुकुट आया। सामान्य राजनीति होती तो मुकुट सिर पर सजता, तस्वीरें खिंचतीं और सम्मान की कहानी वहीं समाप्त हो जाती।

लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उस सम्मान को अपने तक सीमित रखने के बजाय समाज की गरीब बेटियों के लिए उपयोग करने की इच्छा जताकर सम्मान की दिशा ही बदल दी।माथे पर सजने वाला चांदी का मुकुट यदि किसी गरीब बेटी के पैरों में पायल बन जाए, तो उससे सुंदर लोकतांत्रिक संवेदना की कल्पना शायद मुश्किल है।यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीति में महिला सशक्तिकरण की चर्चा बहुत होती है। मंचों पर बड़े-बड़े भाषण होते हैं, घोषणाएं होती हैं, पोस्टर लगते हैं और नारे गूंजते हैं। मगर असली कसौटी तब होती है जब किसी बेटी के सामने आर्थिक संकट हो, जब किसी महिला कार्यकर्ता को अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार चाहिए हो, जब किसी प्रतिभाशाली महिला को संगठन में आगे बढ़ने के लिए केवल अपनी योग्यता पर भरोसा हो और जब उसे यह विश्वास दिलाना हो कि उसकी प्रतिभा ही उसकी पहचान है, किसी व्यक्ति की कृपा नहीं।यहीं से आगरा का यह प्रसंग उत्तर प्रदेश की राजनीति के दूसरे बड़े केंद्रों के लिए भी एक गंभीर संदेश बन जाता है।

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प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए नयी सीख प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए यह समय आत्ममंथन का है। महिला सशक्तिकरण केवल मंच पर महिलाओं को आगे बैठाने, महिला सम्मेलन करने या चुनावी घोषणापत्र में कुछ पंक्तियां जोड़ देने से पूरा नहीं होता।सच्चा महिला सशक्तिकरण तब दिखाई देता है जब पार्टी की कोई युवा महिला कार्यकर्ता अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ सके; जब किसी विधायक या सांसद को अपनी राजनीतिक पहचान स्वतंत्र रूप से विकसित करने का अवसर मिले; जब किसी महिला को संगठन में आगे बढ़ने के लिए किसी व्यक्तिगत समीकरण की आवश्यकता न पड़े और जब पार्टी के भीतर योग्यता, संघर्ष और जनसेवा ही तरक्की की असली सीढ़ियां हों।राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं के लिए संगठनात्मक वातावरण इतना सुरक्षित और सम्मानजनक हो कि उन्हें अपनी प्रतिभा के बदले किसी भी प्रकार का अनावश्यक व्यक्तिगत समझौता करने की आवश्यकता महसूस न हो।यह संदेश किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है। हर राजनीतिक दल को अपने भीतर झांकना चाहिए,क्योंकि महिला को केवल चुनाव के समय ‘शक्ति’ कहना आसान है; उसे पूरे राजनीतिक जीवन में स्वतंत्र व्यक्तित्व, निर्णय का अधिकार और सम्मानजनक स्थान देना कठिन है। और लोकतंत्र की असली परीक्षा उसी कठिन हिस्से में होती है।किसी की प्रतिभा किसी की जागीर नहींआज राजनीति में बड़ी संख्या में शिक्षित, प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी युवा महिलाएं आ रही हैं। वे केवल किसी नेता की तस्वीर के पीछे खड़े होने के लिए नहीं आई हैं। वे नीति बनाना चाहती हैं, जनता की आवाज बनना चाहती हैं, चुनाव लड़ना चाहती हैं और नेतृत्व करना चाहती हैं।

ऐसे में किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए—क्या हमारी बेटियां और हमारी युवा महिला कार्यकर्ता अपने दम पर आगे बढ़ सकती हैं?अगर जवाब हां है तो वही वास्तविक महिला सशक्तिकरण हैऔर यदि किसी प्रतिभाशाली महिला को आगे बढ़ने के लिए अपनी स्वतंत्रता, आत्मसम्मान अथवा सिद्धांतों के साथ समझौते का दबाव महसूस हो, तो किसी भी संगठन को इसे अपनी सफलता नहीं, बल्कि अपनी व्यवस्था की कमजोरी मानना चाहिए।राजनीति में किसी व्यक्ति को इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि उसके सामने संगठन की संस्थाएं छोटी पड़ जाएं। लोकतंत्र में व्यक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन संस्था उससे बड़ी होती है।इसीलिए किसी भी दल के नेतृत्व को ऐसा संगठनात्मक ढांचा बनाना चाहिए जहां महिला कार्यकर्ता यह न सोचें कि उनकी राजनीतिक यात्रा किसी एक व्यक्ति की प्रसन्नता पर निर्भर है। उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि पार्टी में उनके लिए दरवाजे योग्यता और जनसेवा से खुलेंगे।“माटी का लाल” होने का अर्थराजनाथ सिंह के चांदी का मुकुट लौटाने के प्रसंग में सबसे सुंदर बात यही है कि उन्होंने सम्मान को अपने सिर से उतारकर समाज की बेटी के पैरों तक पहुंचाने की कल्पना की।यही माटी से जुड़ी राजनीति है।जिस समाज ने संघर्ष किया हो, जिसने अभाव देखे हों, जिसने अपनी बेटियों की विदाई में आंखों के साथ अपनी आर्थिक विवशता भी छिपाई हो, उस समाज के लिए पायल केवल आभूषण नहीं होती—वह सम्मान, खुशी और बेटी के नए जीवन की रुनझुन होती है।जब कोई बड़ा पद पाने वाला व्यक्ति अपने लिए आए सम्मान को समाज की बेटी के नाम कर देता है, तो वह स्वयं छोटा नहीं होता—उसका कद और ऊंचा हो जाता है।राजनीति का वास्तविक वैभव यही है।सत्ता का पद पांच वर्ष का हो सकता है। चुनाव का परिणाम बदल सकता है। राजनीतिक समीकरण आज कुछ और, कल कुछ और हो सकते हैं। लेकिन किसी जरूरतमंद परिवार के जीवन में की गई सहायता और किसी बेटी के चेहरे पर आई मुस्कान की उम्र बहुत लंबी होती है।इसलिए आगरा का यह प्रसंग केवल खटीक समाज के लिए सम्मान का विषय नहीं है। यह उन सभी राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए आईना है जो महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं।बेटी को मंच पर सम्मानित करने से बड़ा काम है—उसे जीवन में अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना।और किसी महिला को देवी कह देना पर्याप्त नहीं; उसे इंसान के रूप में बराबरी, स्वतंत्रता और सम्मान देना जरूरी है।किसी को इतना भी देवत्व मत दीजिए कि उसके सामने सवाल पूछना अपराध और असहमति गुनाह लगने लगे। लोकतंत्र में भगवान का अवतार कोई नेता नहीं होता—लोकतंत्र में असली शक्ति जनता होती है।यही संदेश आगरा से निकलकर लखनऊ तक जाना चाहिए।मुकुट लौटाने वाला नेता यह बता गया कि सम्मान सिर पर रखने की वस्तु नहीं, समाज के बीच बांटने की जिम्मेदारी है।अब राजनीति के हर नेतृत्व के सामने सवाल है—क्या आपकी पार्टी में भी ऐसी व्यवस्था है, जहां आपकी बेटियां बिना किसी भय, दबाव या व्यक्तिगत समीकरण के केवल अपनी प्रतिभा और जनसेवा के बल पर आगे बढ़ सकें?अगर उत्तर हां है, तो महिला सशक्तिकरण वास्तविक है।अगर उत्तर नहीं है, तो मंचों के नारों से आगे बढ़कर संगठन के भीतर सुधार की जरूरत है।आगरा की उस चांदी की चमक में इसलिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है—सम्मान वह नहीं जो किसी नेता के सिर पर चमके; सम्मान वह है जो किसी बेटी के जीवन में उजाला करे और जिस दिन राजनीति इस अंतर को समझ लेगी, उसी दिन लोकतंत्र की संवेदना और मजबूत होगी। डॉ. सुनील कुमार राजनीतिक विश्लेषण, असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर.

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विवेक सिंह 24indianewslive.com के संचालक हैं. वह डिजिटल न्यूज़, मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत हैं। 24 India News Live के माध्यम से तथ्यपरक, तेज और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुँचाने का उनका प्रयास है।

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