
जौनपुर खेतासराय। पारा कमाल गांव से निकलकर मुंबई में शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में पहचान बनाने वाले प्रो. जावेद खान का जीवन संघर्ष और उपलब्धियों से भरा रहा। बचपन में पढ़ाई के लिए वह रेलवे ट्रैक के किनारे पैदल चलकर शाहगंज स्थित स्कूल जाते थे। आने-जाने में करीब 12 किलोमीटर की दूरी तय करते थे। कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। यही संघर्ष आगे चलकर उन्हें मुंबई में प्रोफेसर से महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट मंत्री तक ले गया।वर्ष 1960 में मुंबई पहुंचे जावेद खान ने खालसा कॉलेज में गणित के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया।
भरत मिलाप में सामाजिक संगठनों ने की सेवा चाय पानी और नि:शुल्क चिकित्सा शिविर की रही व्यवस्थाइसके बाद राजनीति में सक्रिय हुए। वर्ष 1985 में कांग्रेस के टिकट पर ट्रॉम्बे विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक चुने गए। महाराष्ट्र सरकार में शिक्षा, गृह निर्माण और श्रम जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। शिक्षा मंत्री रहते हुए व्यावसायिक शिक्षा के विस्तार और नए शिक्षण संस्थानों के विकास में उनकी भूमिका रही।
वर्ष 1999 में कांग्रेस से अलग होकर शरद पवार के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। इसके बाद उन्हें सिडको का चेयरमैन बनाया गया। वह महाराष्ट्र हज कमेटी, उर्दू अकादमी और रेलवे भर्ती बोर्ड जैसी संस्थाओं में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। गृह निर्माण मंत्री रहते हुए मुंबई में आवास से जुड़ी योजनाओं में भी उन्होंने काम किया।मुंबई में ऊंचे पदों पर पहुंचने के बावजूद पारा कमाल और जौनपुर से उनका जुड़ाव बना रहा। गांव में बच्चों की शिक्षा के लिए विद्यालय की स्थापना में उनका योगदान रहा।
मो. हसन डिग्री कॉलेज, जौनपुर की स्थापना में भी उनकी अहम भूमिका रही और वह संस्थापक अध्यक्ष रहे। महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी और उर्दू अकादमी से जुड़कर साहित्यिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया।रेलवे ट्रैक के किनारे पैदल चलकर स्कूल जाने से शुरू हुआ उनका सफर मुंबई में प्रोफेसर और महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने तक पहुंचा। एक अक्टूबर को उनकी जयंती पर क्षेत्र के लोग उनके संघर्ष और योगदान को याद करते हैं। प्रो. जावेद खान का 31 अक्टूबर 2020 को निधन हो गया था। उनके पुत्र नदीम जावेद भी कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय है, और वर्ष 2012 में जौनपुर सदर से विधायक चुने गए।
















