

श्रीराम’ और ‘सिया राम, जय राम, जय जय राम’ के जयघोष गूंजते रहे।इस धार्मिक आयोजन की विशेष बात यह है कि एक करोड़ आठ लाख बार श्रीराम नाम लिखने का संकल्प भी लिया जाएगा, जो प्रभु श्रीराम के प्रति श्रद्धा, आस्था और समर्पण का प्रतीक है।शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से दिया आध्यात्मिक संदेशकथा के दौरान शांतनु जी महाराज ने भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद का अत्यंत भावपूर्ण एवं सुंदर वर्णन किया। कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने योग, साधना और आत्मचिंतन के महत्व को समझाया।
भरत मिलाप में सामाजिक संगठनों ने की सेवा चाय पानी और नि:शुल्क चिकित्सा शिविर की रही व्यवस्थामहाराज जी ने कहा कि योग के माध्यम से मनुष्य अपने मन को एकाग्र कर आत्मिक शांति प्राप्त कर सकता है। अहंकार मनुष्य के पतन का प्रमुख कारण है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा अथवा उपलब्धियों पर घमंड करने लगता है, तब उसके विनाश का मार्ग प्रशस्त होने लगता है।उन्होंने कहा कि भगवान शिव वैराग्य, करुणा, तपस्या और कल्याण के प्रतीक हैं। उनके जीवन से हमें विनम्रता, संयम और परोपकार की प्रेरणा मिलती है। योग के आठवें अंग समाधि का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि साधना की सर्वोच्च अवस्था में साधक का मन गहन एकाग्रता और आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़ता है।
भक्ति की महिमा सुन भावुक हुए श्रद्धालुशांतनु जी महाराज ने भगवान और उनकी भक्ति की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि सच्ची भक्ति के लिए धैर्य, श्रद्धा, समर्पण और निरंतर साधना आवश्यक है। जब भक्त सच्चे हृदय से प्रभु का स्मरण करता है, तब उसका जीवन आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित हो उठता है। कथा के दौरान भक्ति रस में डूबे श्रद्धालुओं की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी और पूरा वातावरण राममय हो गया।

महाराज जी ने समझाया कि प्रभु की प्राप्ति केवल बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निर्मल मन, सच्चे आचरण और अटूट विश्वास से होती है। भक्ति मनुष्य के भीतर प्रेम, करुणा और सद्भाव का संचार करती है तथा उसे जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।नारद जी के प्रसंग से समझाया अहंकार का परिणामकथा के दौरान शांतनु जी महाराज ने देवर्षि नारद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए अहंकार के दुष्परिणामों को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति अपनी प्रशंसा सुनकर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, तब उसका विवेक प्रभावित होने लगता है। नारद जी के प्रसंग के माध्यम से भगवान श्रीहरि की लीला और अहंकार के निवारण का संदेश दिया गया।महाराज जी ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की अत्यधिक प्रशंसा होने लगे, तब उसे और अधिक विनम्र तथा सावधान हो जाना चाहिए।
प्रशंसा को अपनी महानता का प्रमाण मानने के बजाय उसे जिम्मेदारी और आत्ममंथन का अवसर समझना चाहिए। अहंकार व्यक्ति की उपलब्धियों को भी कमजोर कर सकता है, जबकि विनम्रता उसे सम्मान और सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।उन्होंने यह भी बताया कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की मर्यादा संकट में पड़ती है, तब भगवान विभिन्न रूपों में अवतरित होकर धर्म की स्थापना और मानवता के कल्याण का संदेश देते हैं। भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और आदर्श आचरण का अनुपम उदाहरण है।श्रीराम जन्मोत्सव ने वातावरण को बनाया भक्तिमयभगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का प्रसंग आते ही कथा स्थल का वातावरण उल्लास और भक्ति से भर गया। श्रद्धालु भगवान के जन्म की मंगलमयी कथा सुनकर भावविभोर हो उठे। जय श्रीराम के जयघोष, भजन और भक्तों की आस्था ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।पूज्य शांतनु जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि श्रीराम कथा का वास्तविक उद्देश्य केवल कथा सुनना नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना है। यदि मनुष्य सत्य, मर्यादा, सेवा, त्याग, प्रेम और विनम्रता को अपना ले, तो उसका जीवन सार्थक हो सकता है।वरिष्ठ भाजपा नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के सौजन्य से आयोजित यह श्रीराम कथा जौनपुर में धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक चेतना का संदेश दे रही है। कथा के दूसरे दिन उमड़ी श्रद्धालुओं की आस्था ने यह स्पष्ट कर दिया कि भगवान श्रीराम के प्रति लोगों का प्रेम और समर्पण आज भी अटूट है।सिया राम, सिया राम, जय जय राम।
















