मुलायम से अखिलेश तक: रिश्तों की राजनीतिमुलायम सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष

राजनीति में जब-जब दोस्ती, भरोसे और रिश्तों की बात होगी, तब-तब नेताजी मुलायम सिंह यादव का नाम जरूर याद आएगा। राजनीति में रणनीति बनाना और सत्ता हासिल करना अपनी जगह है, लेकिन जमीन से जुड़े लोगों को सम्मान देना और रिश्तों को निभाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। नेताजी इस कला के माहिर थे।
पार्टी के किसी बड़े पदाधिकारी, विधायक या जिलाध्यक्ष के घर खुशी हो या गम, नेताजी के परिवार का कोई न कोई सदस्य वहां जरूर पहुंचता था। यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के प्रति अपनापन और सम्मान का प्रतीक था। इसी कारण कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रहता था। कहा जा सकता है कि अगर किसी नेता ने रिश्तों की पूंजी को जीवनभर सहेजकर रखा, तो वह मुलायम सिंह यादव थे।
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HIGHLIGHTS
  • नेताजी ने न जाने कितने साधारण कार्यकर्ताओं को पहचान, प्रतिष्ठा, पद और राजनीतिक हैसियत दी। जरूरत पड़ने पर सामाजिक सम्मान
  • पहली पंक्ति के नेताओं पर निर्भर नहीं रहते थे, बल्कि दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेतृत्व को भी तैयार करते और लगातार उनकी निगरानी करते थे। यही कारण था कि
  • राजनीतिक और व्यक्तिगत रिश्तों को निभाने में नेताजी ने कभी संकीर्णता नहीं दिखाई। राजनारायण, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के साथ उनके संबंध इस बात की मिसाल हैं कि
  • अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की कार्यशैली को लेकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी में संवाद, विश्वास और सामूहिक निर्णय की परंपरा कमजोर पड़ रही है? राज्यसभा

राजनीति में जब-जब दोस्ती, भरोसे और रिश्तों की बात होगी, तब-तब नेताजी मुलायम सिंह यादव का नाम जरूर याद आएगा। राजनीति में रणनीति बनाना और सत्ता हासिल करना अपनी जगह है, लेकिन जमीन से जुड़े लोगों को सम्मान देना और रिश्तों को निभाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। नेताजी इस कला के माहिर थे।पार्टी के किसी बड़े पदाधिकारी, विधायक या जिलाध्यक्ष के घर खुशी हो या गम, नेताजी के परिवार का कोई न कोई सदस्य वहां जरूर पहुंचता था। यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के प्रति अपनापन और सम्मान का प्रतीक था। इसी कारण कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रहता था।

कहा जा सकता है कि अगर किसी नेता ने रिश्तों की पूंजी को जीवनभर सहेजकर रखा, तो वह मुलायम सिंह यादव थे।नेताजी ने न जाने कितने साधारण कार्यकर्ताओं को पहचान, प्रतिष्ठा, पद और राजनीतिक हैसियत दी। जरूरत पड़ने पर सामाजिक सम्मान और आर्थिक मदद के लिए भी हाथ बढ़ाया। वे केवल पहली पंक्ति के नेताओं पर निर्भर नहीं रहते थे, बल्कि दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेतृत्व को भी तैयार करते और लगातार उनकी निगरानी करते थे। यही कारण था कि सत्ता से बाहर होने के बावजूद समाजवादी पार्टी दोबारा सत्ता में लौट आती थी।अपने राजनीतिक और व्यक्तिगत रिश्तों को निभाने में नेताजी ने कभी संकीर्णता नहीं दिखाई।

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राजनारायण, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के साथ उनके संबंध इस बात की मिसाल हैं कि राजनीति में विचारों और रणनीतियों के साथ रिश्तों का भी अपना महत्व होता है।**लेकिन सवाल यह है कि क्या आज समाजवादी पार्टी में वही राजनीतिक संस्कृति बची है?**अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की कार्यशैली को लेकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी में संवाद, विश्वास और सामूहिक निर्णय की परंपरा कमजोर पड़ रही है? राज्यसभा की उम्मीदवारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर यदि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और परिवार के प्रमुख सदस्यों तक को समय रहते जानकारी नहीं मिलती, तो इससे संगठन के भीतर असहजता पैदा होना स्वाभाविक है। राजनीति में गोपनीयता रणनीति का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जब गोपनीयता संवाद की जगह लेने लगे, तो उसके परिणाम नुकसानदेह हो सकते हैं।शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव और डिंपल यादव जैसे महत्वपूर्ण चेहरों के साथ भी यदि पर्याप्त संवाद नहीं हो पाता, तो यह नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

संगठन केवल चुनावी गणित से नहीं चलता, बल्कि विश्वास, भागीदारी और सम्मान से मजबूत होता है।**जौनपुर का सोनकर समाज: राजनीतिक उपेक्षा से प्रतिनिधित्व तक की कहानी**मैं जौनपुर की राजनीति और सामाजिक समीकरणों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अनुभव साझा करना चाहता हूं। जब मैंने जिले में भाजपा के संगठनात्मक ढांचे पर नजर डाली, तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिला कार्यकारिणी से लेकर जिलाध्यक्ष के स्तर तक सोनकर समाज का कोई प्रतिनिधित्व दिखाई नहीं दिया।मैंने सोनकर समाज के लोगों से इसका कारण पूछा। उनका जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने स्वीकार किया कि लोकसभा चुनाव में समाज के एक वर्ग ने सोनकर प्रत्याशियों के खिलाफ मतदान किया और समाजवादी पार्टी का समर्थन किया। उनके अनुसार, जौनपुर की दोनों संसदीय सीटों पर सोनकर समाज की संख्या एक लाख से अधिक है और मछलीशहर विधानसभा क्षेत्र में भी समाज की संख्या तीन डिजीट में है।यह स्थिति मेरे लिए चिंता का विषय थी। मैंने भाजपा के जिले से लेकर प्रदेश और शीर्ष नेतृत्व तक, जहां-जहां मेरी व्यक्तिगत बातचीत और संपर्क था, इस विषय को गंभीरता से उठाया। मुझे आश्वासन मिला कि पार्टी इस मुद्दे पर विचार करेगी और सामाजिक प्रतिनिधित्व को उचित महत्व दिया जाएगा।आज विद्यासागर सोनकर को राज्यसभा के लिए चुने जाने को मैं उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखता हूं। इस चयन को लेकर विरोध और दूसरे दावेदारों की सक्रियता के बावजूद पार्टी ने सोनकर समाज को प्रतिनिधित्व देने का निर्णय लिया। यह फैसला केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक संतुलन के महत्व को भी रेखांकित करता है।जौनपुर में भाजपा संगठन के प्रभारी शंकर गिरि, जो वाराणसी के निवासी और मेरे करीबी मित्रों में हैं, को भी मैंने इस विषय से अवगत कराया था। मेरी अपेक्षा है कि भविष्य में संगठनात्मक फेरबदल के दौरान सोनकर समाज को उचित स्थान मिलेगा और उसकी राजनीतिक भागीदारी को मजबूती दी जाएगी।यह उदाहरण बताता है कि भाजपा सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक दृष्टि से गंभीरता से लेने का प्रयास करती है। किसी समाज की उपेक्षा लंबे समय तक नहीं की जा सकती। यदि कोई समाज संख्या, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक भागीदारी के बावजूद संगठन में स्थान नहीं पाता, तो उसके भीतर असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। समय रहते संवाद और प्रतिनिधित्व के माध्यम से इस असंतोष को दूर किया जा सकता है।**2027 की राह: अखिलेश यादव के लिए आत्ममंथन का समय**उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव केवल जातीय समीकरणों या सत्ता-विरोधी लहर का चुनाव नहीं होगा। यह संगठन, नेतृत्व, सामाजिक भागीदारी और कार्यकर्ताओं के सम्मान की भी परीक्षा होगी।मुलायम सिंह यादव ने जिन रिश्तों को वर्षों की मेहनत से बनाया था, वे केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं थे, बल्कि समाजवादी पार्टी की राजनीतिक ताकत का आधार थे। कार्यकर्ता को यह भरोसा रहता था कि नेतृत्व उसके सुख-दुख में साथ खड़ा होगा और उसे आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।अखिलेश यादव को यह समझना होगा कि विरासत केवल पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न या राजनीतिक आधार मिलने से आगे नहीं बढ़ती। विरासत को जीवित रखने के लिए उन मूल्यों को भी अपनाना पड़ता है, जिनसे वह विरासत बनी थी।यदि समाजवादी पार्टी में संवाद, वरिष्ठ नेताओं का सम्मान, सामाजिक संतुलन और जमीनी कार्यकर्ताओं की भागीदारी मजबूत नहीं हुई, तो 2027 में उसे बड़ा राजनीतिक झटका लग सकता है। केवल रणनीति और चुनावी घोषणाओं के सहारे सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी। *राजनीति में सत्ता का रास्ता चुनाव से होकर जरूर गुजरता है, लेकिन सत्ता तक पहुंचने की जमीन रिश्तों, विश्वास और सम्मान से तैयार होती है। मुलायम सिंह यादव ने इस सच्चाई को समझा था। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव इस विरासत से कितना सीखते हैं।* डॉक्टर सुनील कुमार राजनीतिक विश्लेषक, असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर


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विवेक सिंह 24indianewslive.com के संचालक हैं. वह डिजिटल न्यूज़, मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत हैं। 24 India News Live के माध्यम से तथ्यपरक, तेज और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुँचाने का उनका प्रयास है।

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