
जौनपुर। भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह की अगुवाई में सेवा भारती के नेतृत्व में नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज परिसर में चल रही श्रीराम कथा में आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव सहित कई धार्मिक प्रसंगों का मार्मिक वर्णन किया। कथा के दौरान भगवान शिव-पार्वती संवाद, भक्त के प्रति भगवान के प्रेम, निर्गुण-सगुण स्वरूप और धरती पर अधर्म बढ़ने पर भगवान के अवतार लेने के प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म, विश्वास और भक्ति का संदेश दिया।
उन्होंने माता पार्वती के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि किसी भी विषय को समझने के लिए विश्वास और धैर्य आवश्यक हैं। माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रश्न किया कि भगवान श्रीराम ब्रह्म हैं या कोई अन्य। भगवान शिव ने बताया कि राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम ही परम ब्रह्म हैं। माता पार्वती के मन में संशय उत्पन्न हुआ कि यदि श्रीराम ब्रह्म हैं, तो उन्हें अपनी पत्नी सीता के हरण के विषय में जानकारी क्यों नहीं है। महाराज ने बताया कि माता पार्वती के मन में उत्पन्न संशय दूर नहीं हुआ और वह भगवान शिव के मना करने के बावजूद भगवान श्रीराम की परीक्षा लेने पहुंच गईं।
उन्होंने माता सीता का रूप धारण कर भगवान श्रीराम के सामने आने का प्रयास किया। भगवान श्रीराम ने उन्हें पहचान लिया और माता कहकर संबोधित किया। इससे माता पार्वती को भगवान श्रीराम की दिव्यता का बोध हुआ।कथा के अनुसार, वापस लौटने पर माता पार्वती ने भगवान शिव से अपने परीक्षण के विषय में सत्य नहीं बताया। इसके बाद भगवान शिव समाधि में लीन हो गए। आचार्य जी ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि भगवान के स्वरूप को समझने के लिए मन में श्रद्धा और विश्वास होना आवश्यक है। संशय भक्ति के मार्ग में बाधा बन सकता है।उन्होंने कहा कि धर्म की आड़ में अधर्म नहीं होना चाहिए। जब धर्म के नाम पर गलत कार्य होने लगते हैं, तब उसे रोकना आवश्यक हो जाता है। अधर्म को रोकने और धर्म की स्थापना के लिए भगवान को भी लीला करनी पड़ी।
उनके प्रत्येक अवतार और लीला के पीछे संसार के कल्याण का भाव निहित है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति शांत रहेगा, वही वास्तविक अर्थों में सुंदर होगा। अशांत व्यक्ति स्वयं भी परेशान रहता है और अपने परिवार को भी अशांत रखता है। मनुष्य जैसा भीतर से होता है, उसका प्रभाव उसके बाहरी व्यवहार में भी दिखाई देता है। सहज और सरल स्वभाव जीवन को सुखमय बनाता है। उन्होंने भगवान शिव के स्वरूप का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान शंकर सहज, शांत और सुंदर हैं। मनुष्य को भी अपने जीवन में इन्हीं गुणों को अपनाना चाहिए। क्रोध, अहंकार और संशय से दूर रहकर प्रेम, विश्वास और सद्भाव के साथ जीवन जीना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।

















