

जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के आयोजन में चल रही नौ दिवसीय श्रीरामकथा के नवें एवं अंतिम दिन कथाव्यास परम पूज्य आचार्य शांतनु जी महाराज ने श्रीरामचरितमानस के शबरी प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया। भगवान श्रीराम और माता शबरी की अनन्य भक्ति के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
कथा के माध्यम से भक्ति, समता, त्याग, समर्पण, मित्रता और आदर्श शासन का संदेश दिया गया।आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम ने माता शबरी के जूठे बेर स्वीकार कर यह संदेश दिया कि भगवान जाति-पाति और भेदभाव नहीं देखते, बल्कि भक्त के भाव को देखते हैं। सच्ची भक्ति में किसी प्रकार का भेद नहीं होता। शबरी का समर्पण और प्रभु श्रीराम का उनके प्रति स्नेह समाज में समानता और प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करता है।
किष्किंधा प्रसंग का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि बाली अपार शक्तिशाली होने के बावजूद अहंकार और अधर्म के मार्ग पर चला गया। वहीं प्रभु श्रीराम ने सुग्रीव से मित्रता कर उसे न्याय दिलाया। इससे यह संदेश मिलता है कि सच्चा मित्र वही है, जो विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़ा रहे और न्याय के लिए सहयोग करे।सुंदरकांड का उल्लेख करते हुए आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि हनुमान जी ने अपने आत्मविश्वास और प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट विश्वास के बल पर समुद्र पार किया।
यह प्रसंग विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास, संकल्प और ईश्वर पर विश्वास हो तो कठिन से कठिन लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सकता है।रावण के प्रसंग पर उन्होंने कहा कि वह चारों वेदों का ज्ञाता और अत्यंत विद्वान था, लेकिन अहंकार ने उसके ज्ञान और सामर्थ्य को विनाश की ओर धकेल दिया। उन्होंने श्रद्धालुओं को अहंकार से दूर रहकर सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने और राज्याभिषेक का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। महाराज ने कहा कि रामराज्य आदर्श शासन, न्याय, मर्यादा और लोककल्याण का प्रतीक है।कथा के अंतिम दिन बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह ने कहा कि श्रीरामकथा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के गौरवशाली संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और संस्कारों से जुड़े, यही इस आयोजन की सबसे बड़ी भावना है।अंत में ज्ञान प्रकाश सिंह ने कथा में पहुंचे सभी श्रद्धालुओं और गणमान्य लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह कथा भगवान की महिमा के बिना संभव नहीं हो सकती थी। वह स्वयं को प्रभु का एक तुच्छ सेवक बताते हुए बोले कि भगवान की कृपा और महिमा से ही यह आयोजन सफल हो सका।कथा के समापन अवसर पर जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

















