एक दिवाली घर के आँगन में दूसरी सरहद पर गोलों और धमाकों के बीच

एक दिवाली घर के आँगन में, दूसरी सरहद पर गोलों और धमाकों के बीच!
जब देश दीप जलाकर खुशियाँ मनाता था, तब सरहद पर सैनिक गोलियों की आवाज के बीच देश की सुरक्षा का संकल्प निभाता था।
दीपावली खुशियों, रोशनी, प्रेम और अपनों के साथ रहने का त्योहार है। इस दिन हर घर में दीप जलते हैं, बच्चे पटाखे चलाते हैं, मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं और परिवार एक-दूसरे के साथ खुशियाँ मनाता है। लेकिन क्या हमने कभी उस सैनिक की दीपावली के बारे में सोचा है, जिसकी दिवाली घर के आँगन में नहीं, बल्कि देश की सरहद पर होती है?
आज भी जब हम दीपावली की जगमगाहट देखते हैं, तो पुराने सैनिकों के मन में सरहद पर बिताई वे दीपावलियाँ जरूर जीवंत हो उठती होंगी, जब आसमान में दीपों की रोशनी से अधिक गोलाबारी की चमक दिखाई देती थी।
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HIGHLIGHTS
  • देश के किसी कोने में पटाखों की आवाज गूँजती थी, तब सीमा पर तैनात जवानों के कानों में कभी-कभी तोपों के गोले, गोलियों और धमाकों की आवाजें गूँजती थीं। वहाँ यह पहचानना भी कठिन हो…
  • आवाज त्योहार की है और कौन-सी दुश्मन की ओर से आई है। उन दिनों सैनिकों की दीपावली किसी उत्सव से कम नहीं, बल्कि
  • पड़ती थी। न घर का आँगन, न परिवार का साथ, न माँ के हाथों की मिठाई और न ही बच्चों की किलकारियाँ। साथी सैनिक ही परिवार होते थे।
  • और बच्चों की तस्वीर निहारता और कोई चुपचाप आसमान की ओर देखकर अपने परिवार को याद करता। कभी किसी छोटी-सी चौकी पर साथी जवान मिलकर थोड़ी मिठाई बाँट लेते, एक छोटा-सा

जब देश दीप जलाकर खुशियाँ मनाता था, तब सरहद पर सैनिक गोलियों की आवाज के बीच देश की सुरक्षा का संकल्प निभाता था।दीपावली खुशियों, रोशनी, प्रेम और अपनों के साथ रहने का त्योहार है। इस दिन हर घर में दीप जलते हैं, बच्चे पटाखे चलाते हैं, मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं और परिवार एक-दूसरे के साथ खुशियाँ मनाता है। लेकिन क्या हमने कभी उस सैनिक की दीपावली के बारे में सोचा है, जिसकी दिवाली घर के आँगन में नहीं, बल्कि देश की सरहद पर होती है?

आज भी जब हम दीपावली की जगमगाहट देखते हैं, तो पुराने सैनिकों के मन में सरहद पर बिताई वे दीपावलियाँ जरूर जीवंत हो उठती होंगी, जब आसमान में दीपों की रोशनी से अधिक गोलाबारी की चमक दिखाई देती थी। जब देश के किसी कोने में पटाखों की आवाज गूँजती थी, तब सीमा पर तैनात जवानों के कानों में कभी-कभी तोपों के गोले, गोलियों और धमाकों की आवाजें गूँजती थीं। वहाँ यह पहचानना भी कठिन हो जाता था कि कौन-सी आवाज त्योहार की है और कौन-सी दुश्मन की ओर से आई है।उन दिनों सैनिकों की दीपावली किसी उत्सव से कम नहीं, बल्कि एक कठिन परीक्षा होती थी।

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कई बार त्योहार के दिन भी पूरी रात चौकसी करनी पड़ती थी। न घर का आँगन, न परिवार का साथ, न माँ के हाथों की मिठाई और न ही बच्चों की किलकारियाँ। साथी सैनिक ही परिवार होते थे। ड्यूटी के बीच यदि कुछ पल मिल जाते, तो कोई घर से आया पत्र पढ़ता, कोई पत्नी और बच्चों की तस्वीर निहारता और कोई चुपचाप आसमान की ओर देखकर अपने परिवार को याद करता।कभी किसी छोटी-सी चौकी पर साथी जवान मिलकर थोड़ी मिठाई बाँट लेते, एक छोटा-सा दीप जला लेते और एक-दूसरे को दीपावली की शुभकामनाएँ देते। लेकिन उस मुस्कान के पीछे घर से दूर होने का दर्द और हर पल सतर्क रहने की जिम्मेदारी छिपी रहती थी।

सोचिए, जिस समय एक माँ अपने बेटे की लंबी उम्र के लिए दीप जला रही होती है, उसी समय उसका बेटा सीमा पर हथियार थामे देश की रक्षा कर रहा होता है। पत्नी अपने पति की राह देखती है, बच्चे अपने पिता से फोन पर बात करने का इंतजार करते हैं। कभी संपर्क नहीं हो पाता, तो त्योहार की खुशियाँ भी चिंता में बदल जाती हैं।सैनिक भी इंसान है।

उसके मन में भी घर लौटने की इच्छा होती है। उसे भी त्योहार पर अपने परिवार के बीच बैठने का मन करता है। लेकिन वह अपनी व्यक्तिगत खुशियों को राष्ट्र की सुरक्षा से ऊपर नहीं रखता। यही सैनिक के जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई और सबसे बड़ा त्याग है।एक सैनिक जब अपनी चौकी पर खड़ा होता है, तो उसके पीछे करोड़ों घरों की रोशनी सुरक्षित रहती है। वह स्वयं अँधेरे, ठंड, खतरे और अकेलेपन में रहकर दूसरों के घरों में उजाला बनाए रखता है।आज हम सभी नागरिकों का दायित्व है कि दीपावली पर उन वीर सैनिकों के साथ उनके परिवारों को भी याद करें।

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सैनिकों का सम्मान केवल एक दिन की शुभकामनाओं या सोशल मीडिया संदेशों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके परिवारों के सुख-दुःख में समाज और प्रशासन को भी सहभागी बनना चाहिए।आइए, इस दीपावली एक दीप उन सैनिकों के नाम जलाएँ, जिन्होंने कभी गोलों और धमाकों के बीच अपनी दिवाली बिताई, ताकि हमारे घरों में शांति और खुशियों के दीप जलते रहें।याद रखिए, हमारी दिवाली की हर रोशनी के पीछे किसी सैनिक की जागती आँखें, उसका त्याग और उसके परिवार की अनगिनत प्रतीक्षाएँ हैं।वह सरहद पर जागता है, तभी हमारा देश चैन से सोता है।जय जवान! जय हिंद!लेखक:कैप्टन अजीत कुमार पाण्डेयसंरक्षक, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक संगठन, जौनपुर (उ.प्र.)

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Vivek Singh
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विवेक सिंह 24indianewslive.com के संचालक हैं. वह डिजिटल न्यूज़, मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत हैं। 24 India News Live के माध्यम से तथ्यपरक, तेज और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुँचाने का उनका प्रयास है।

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